Gajendra Moksha Stotra Lyrics Stuti (Hindi /English) : गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र

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Gajendra Moksha Stotra Lyrics in Hindi English With meaning Story . Gajendra Stotra eliminates debt, relieves the enemy and destroys misfortune.

Gajendra Moksha Stotra

गजेंद्र स्तवन से ऋण मुक्ति, शत्रु से छुटकारा और दुर्भाग्य का नाश होता है।

एक दिन गजराज अपने परिवार के साथ अठखेलियां खेलते हुए जीवन के आनंद को पूर्ण रूप से लेते हुए नदी में स्नान कर रहा था। तभी उसके नदी में प्रवेश करने के उपरांत नदी में उपस्थित ग्राह द्वारा गजराज के पैर को दबोच लिया जाता है, गजराज अपने को छुड़ाने के लिए भरपूर प्रयास करता है। लेकिन सभी प्रयासों में असफल हो गया। दर्द और पीड़ा की अवस्था में गजराज भगवान की स्तुति करते हैं। इस पवित्र स्तुति में किसी भी देवता के नाम का स्मरण नहीं किया गया है। लेकिन भक्तवत्सल भगवान श्री हरि भक्ति के वशीभूत हो ग्राह का भी उद्घार कर गजराज को नव जीवन प्रदान करते है।

विद्वान इस विषय की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि सर्वप्रथम भगवान श्री हरि ने ग्राह का उद्धार किया था ना कि गजराज का, ऐसा क्यूं? ऐसा इसलिए किया था क्योंकि ग्राह ने शरणागत वत्सल भगवान् के भक्त का पैर पकड़ा था। और भगवान् भक्त के अधीन रहते है। इसीलिए भगवान ने भक्त के पैर पकड़ने वाले का सर्वप्रथम उद्धार किया।

इस मंत्र के मनोभाव और मनोयोग से पाठ करने से भगवान हरि शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं।

Gajendra Moksha Stotra Lyrics in Hindi Fonts


एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि |
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ||

ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम |
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ||

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं |
योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम ||

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं क्वचिद्वीभातं क्व च तत्तिरोहितम |
अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षते स आत्ममूलोवतु मां परात्पर ||

कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु |
तमस्तदाsssसीद गहनं गभीरं यस्तस्य पारेsभिविराजते विभुः ||

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदुर्जन्तु: पुनः कोऽर्हति गंतुमीरितुम |
यथा नाटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो दुरत्ययानुक्रमणः स माऽवतु ||

दीदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलं विमुक्तसंगा मुनयः सुसाधवः |
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने भुतात्मभूताः सुह्रदः स मे गतिः ||

न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा न नामरूपे गुणदोष एव वा |
तथापि लोकप्ययसंभवाय यः स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ||

तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये |
अरुपायोरुरुपाय नम आश्चर्यकर्मणे |

नम आत्मप्रदिपाय साक्षिणे परमात्मने |
नमो गिरां विदुराय मनसश्चेतसामपि ||

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्र्चिता |
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ||

नमः शांताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे |
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ||

क्षेत्रज्ञान नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे |
पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ||

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे |
असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ||

नमो नमस्ते खिल कारणाय निष्कारणायाद्भुत कारणाय |
सर्वागमाम्नायमहार्णवाय नमोऽपवर्गाय परायणाय ||

गुणारणिच्छन्नचिदूष्मपाय तत्क्षोभ-विस्फूर्जितमानसाय |
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ||

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय मुक्ताय भुरिकरुणाय नमोऽलयाय |
स्वांशेनसर्वतनुभृत्मनसि-प्रतीत-प्रत्यग् दृशे भगवते बृहते नमस्ते ||

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तैः दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय |
मुक्तात्मभिः स्वह्रदये परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नमः ईश्र्वराय ||

यं धर्मकामार्थ-विमुक्तिकामाः भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति |
किंत्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययम् करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम् ||

एकांतिनो यस्य न कंचनार्थम् वांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः |
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलम् गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः ||

तमक्षरं ब्रह्म परं परेशमव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् |
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूरम् अनंतमाद्यं परिपूर्णमिडे ||

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्र्चराचराः |
नामरुपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ||

यथार्चिषोऽग्ने सवितुर्गभस्तयोः निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः |
तथा यतोऽयं गुणसंप्रवाहो बुद्धिर्मनः ख्रानि शरीरसर्गाः ||


स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ न स्त्री न षंढो न पुमान् न जन्तुः |
नायं गुणः कर्म न सन्न चासन् निषेधशेषो जयतादशेषः ||

जिजी विषे नाहमियामुया किम् अन्तर्बहिश्र्चावृतयेभयोन्या |
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लवः तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम ||

सोऽहं विश्र्वसृजं विश्र्वमविश्र्वं विश्र्ववेदसम् |
विश्र्वात्मानमजंब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम् ||

योगरंधितकर्माणो ह्रदि योग-विभाविते |
योगिनो यं प्रपश्यति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम् ||

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेगशक्तित्रयायाखिलधीगुणाय |
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तयेकदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ||

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहं धिया हतम् |
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवंतमितोऽस्म्यहम् ||

श्री शुक उवाच | Shri Shuk Uvach


एवं गजेन्द्र मुपवर्णितनिर्विशेषम् ब्रह्मादयो विविधलिंग भिदाभिमानाः |
नैते यदोपससृपुनिंखिलात्मकत्वात् तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ||

तं तद्वदार्तमुपलभ्य जगन्निवासः स्तोत्रं निशम्य दिविजै सह संस्तुवद्भिः |
छंदोमयेन गरुडेन समुह्यमानः चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ||

सोऽन्तः सरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो दृष्टवा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम् |
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रान्नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते ||

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य सग्राहमाशु सरसः कृपायोज्जहार |
ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रम् संपश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम ||

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Web Title: Gajendra Moksha Stotra Song Lyrics,

Gajendra Moksha Stotra Song From The Album Gajendra Moksha Stotra Is Released On May 07, 2018. The Duration Of The Aarti Is 09:02.

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